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नागपंचमी पर घर घर पूजे गये नाग देवता

प्रेम कुमार

पारंपरिक खेलों के नाम पर महज खानापूर्ति

दिलदारनगर। सावन माह के शुक्लपक्ष के पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में नागों की पूजा करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। भगवान शिव के गले में हार बन शोभा बढ़ाते नाग देवता, तो भगवान विष्णु की शैय्या बने शेष नाग , तो वहीं पृथ्वी को अपने फन पर टिकाये शेष नाग के प्रति हिन्दू धर्म में काफी महत्व दिया गया है और इसी को लेकर नाग वंशावली के प्रति आस्था और महत्ता को लेकर इनकी पूजा की परंपरा चली आ रही है।मंगलवार को सावन मास का पंचमी तिथि होने के कारण नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में नाग देवता की पूजा महुआ के पत्ते या प्लास के पत्ते का दोना बना घरों की साफसफाई कर धान का लावा और गाय के दूध से नाग देवता को श्रद्धालुओं द्वारा भोग लगाया गया।

पारंपरिक खेलों के नाम पर महज कोरम पूरा किया गया–
नाग पंचमी के दिन पहले कुश्ती प्रतियोगिता, उढा फांदना, चिका, कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल का जादू सर चढ़ कर बोलता था।किंतु गांव के अखाड़े में अपना कुश्ती दंगल में दमख़म दिखाते पहलवानों के नाम पर महज गांव के युवा कोरम भर पूरा किया,चिका, कबड्डी और उढा फांद कर महज रस्मअदायगी भर की गई।

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