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हरितालिका तीज पर्व पर वर्ती महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखते हुए पूजन अर्चन किया

तहसील क्षेत्र के सुरहा गांव में तीज व्रत में अपने पति की लंबी आयु के लिए शिव जी की पुजा करती महिला

 

 

 

सेवराई। हरितालिका तीज पर्व पर स्थानीय तहसील क्षेत्र के विभिन्न गांवों के मंदिरों व शिवालयों में व्रती महिलाओं ने विद्वान पंडितों के द्वारा कथा श्रवण किया। इस दौरान वर्ती महिलाओं ने अपने पति की दीर्घायु के लिए 24 घंटे तक अन्न जल त्यागकर निर्जला व्रत रखते हुए भगवान शंकर और माता पार्वती की पूजा अर्चना की।

 

हरतालिका व्रत को हरतालिका तीज भी कहते हैं। यह व्रत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र के दिन होता है। इस दिन कुमारी और सौभाग्यवती स्त्रियाँ गौरीशंकर की पूजा करती हैं। विशेषकर यह त्योहार करवाचौथ से भी कठिन माना जाता है। क्योंकि जहां करवाचौथ में चन्द्र देखने के उपरांत व्रत सम्पन्न कर दिया जाता है। वहीं इस व्रत में पूरे दिन निर्जला व्रत किया जाता है और अगले दिन पूजन के पश्चात ही व्रत सम्पन्न जाता है।

 

व्रती महिलाओं को कथा श्रवण कराते हुए पंडित कृष्णानंद पांडेय ने बताया कि इस व्रत से जुड़ी मान्यता है कि व्रत को करने वाली स्त्रियां पार्वती जी के समान ही सुखपूर्वक पतिरमण करके शिवलोक को जाती हैं। सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग को अखण्ड बनाए रखने और अविवाहित युवतियां मन अनुसार वर पाने के लिए हरितालिका तीज का व्रत करती हैं। सर्वप्रथम इस व्रत को माता पार्वती ने भगवान शिव शंकर के लिए रखा था। इस दिन विशेष रूप से गौरी शंकर का ही पूजन किया जाता है।

 

शिवमंदिर के मुख्य पुजारी इंद्रकांत मिश्र ने बताया कि इस दिन व्रत करने वाली स्त्रियां सूर्योदय से पूर्व ही उठ जाती हैं और नहा धोकर पूरा श्रृंगार करती हैं। पूजन के लिए केले के पत्तों से मंडप बनाकर गौरीशंकर की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इसके साथ पार्वती जी को सुहमें भजन, कीर्तन करते हुए जागरण कर तीन बार आरती की जाती है और शिव पार्वती विवाह की कथा सुनी जाती है। इस व्रत की पात्र कुमारी कन्याएँ व सुहागिन महिलाएँ दोनों ही हैं परन्तु एक बार व्रत रखने उपरांत जीवन पर्यन्त इस व्रत को रखना पड़ता है। यदि व्रती महिला गंभीर रोगी स्थिति में हो तो उसके स्थान पर दूसरी महिला व उसका पति भी इस व्रत को रख सकने का विधान है।

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