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फांसी की सजा का गम नहीं बस नेताजी सुभाष का था इंतजार कर्नल जव्वाद खान को

 

*आजाद हिंद फौज के नायक जव्वाद खां को क्यों नही मिली इतिहास में जगह*

*नेताजी सुभाष के अंगरक्षक जव्वाद खां अचूक निशानेबाज थे*

*अखंड भारत की आजादी के लिए लड़े, विभाजन स्वीकार नही किया* 

गाजीपुर। सुभाषवादी पार्टी भारतीय अवाम पार्टी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साथ आजादी की लड़ाई लड़ने वाले आजाद हिंद फौज के 60 हजार गुमनाम योद्धाओ की तलाश करने और उनका नाम इतिहास में शामिल कर सम्मानित करने हेतु चौखट प्रणाम अभियान चला रहा है। इसी अभियान के तहत भारतीय अवाम पार्टी की टीम राष्ट्रीय महासचिव कुँअर नसीम रजा खां के नेतृत्व में गाजीपुर के गहमर थाने के बारा गांव पहुँची। बारा गांव के जव्वाद खां नेताजी सुभाष के आह्वान पर अंग्रेजो की नौकरी छोड़कर आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। लगभग 1915 में जन्मे कर्नल जव्वाद खां अचूक निशानेबाज थे, उनके इसी प्रतिभा से प्रभावित होकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कर्नल जव्वाद खां को अपने निजी सुरक्षा में तैनात कर लिया। जापान पर परमाणु हमले के बाद द्वितीय विश्व युद्ध की परिस्थिति बदल गयी तब नेताजी आजाद हिन्द फौज को आत्मसमर्पण न करने का निर्देश दिया और कहा कि मातृभूमि कर्ज चुकाने के अंतिम अवसर आ चुका है। सभी फौजी भारत की सीमाओ में प्रवेश कर बाकी काम पूरा करे। कर्नल जव्वाद अपने साथियों को लेकर वर्मा की जंगलो से होते हुए भारत की ओर चल पड़े । महीनों तक एक ही जूता पहने रहने की वजह से उनके पैर के चमड़े सड़ने लगे। जब जूता निकाले तो चमड़ा गल चुका था हड्डियां दिखाई दे रही थी। भारत की सीमा पर अंग्रेज इंतजार कर रहे थे, जैसे ही जव्वाद खां भारत की सीमा में प्रवेश किये अंग्रेजो ने गिरफ्तार कर उन्हें लालकिला में अन्य आजाद हिंद फौज के कैदियों के साथ कैद कर दिया। अंग्रेजी खुफिया एजेंसी की गहरी निगाह जव्वाद खां पर थी, अंग्रेजो के पास इस बात की सूचना थी कि जव्वाद खां नेताजी के निजी सुरक्षा में थे इसलिए यह नेताजी के बारे में सही जानकारी दे सकता है। लालकिले में कैद नेताजी के सहयोगियों को जब फांसी हो गयी तब अंग्रेजो ने जव्वाद खां को फांसी की सजा माफ करने का लालच देकर नेताजी सुभाष की जानकारी चाही। जव्वाद खां ने मुंह नही खोला तब अंग्रेजो ने जव्वाद खां को 95 दिनों तक घोर यातना दी । कोड़े बरसाए, जख्मो पर नमक छिड़का। लेकिन जव्वाद खां नेताजी के बारे में कुछ नही बताये बस यही कहते रहे नेताजी आएंगे और तुम लोगो को भारत से जाना होगा । कर्नल को कड़ी यातना दी गयी बस कर्नल जव्वाद के मुंह से जय हिंद ,दिल्ली जाना है निकलता रहा। अंग्रेजो ने भी कहा कि पता नही ये किस मिट्टी का बना है, सुभाष के प्रति इतनी वफादारी है कि ये मर भी जाएगा तो नही बोलेगा। कुछ दिन बाद फांसी की सजा सबकी माफ हो गयी। कर्नल जव्वाद खां गाजीपुर के बारा गांव लौट आये। बची जिंदगी बहुत खामोश रहे। अंतिम दिनों में भी नेताजी सुभाष के प्रति बहुत गहरी आस्था थी लेकिन उनके रहस्यो के प्रति बहुत सतर्क रहें। नेताजी के बारे में जानते तो बहुत थे लेकिन धन्य है कर्नल जव्वाद खां की वफादारी की अपनी मातृभूमि के महान सपूत सुभाष बाबू का साथ मरते दम तक नही छोड़ा और न ही उनके बारे में किसी को कुछ बताया। बची जिंदगी को खामोशी का चादर ओढा दिया और 1987 मे दुनियाँ छोड़ कर चल बसे। अपने पुश्तैनी गांव बारा के  कब्रिस्तान में दफ्न इस महान योद्धा पर सबको गर्व करना चाहिए लेकिन अफसोस कि कांग्रेस और वामपंथियो ने इनके इतिहास को ही गायब कर मुस्लिमो के योगदान को ही नकार दिया। भारतीय अवाम पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कुँअर नसीम रजा खां ने कर्नल जव्वाद खां के पुत्र हाजी इस्माइल खां से मुलाकात कर जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनके अंगरक्षक जव्वाद खान के बारे मे जानकारी ली तो आंखों से आंसू छलक उठे। बस यही कहे बाबू जब अब्बा जिंदा थे तब आप आते। वो तो सुभाषवादियो का इंतजार कर रहे थे । अंतिम दिन भी बस नेताजी को याद किये, कहे देश नही बंटना चाहिए था। नेताजी आएंगे फिर देश एक होगा। अपनी आंखों में अखंड भारत का सपना लेकर विदा लिए।

कुँअर नसीम रजा खां ने उनकी चौखट को प्रणाम किया, सलामी दी और संकल्प लिया कि भारतीय अवाम पार्टी प्रयास करके जव्वाद खां के इतिहास को बारा गांव में ही आजाद हिंद स्मृति स्तम्भ पर उत्कीर्ण कर कराया जाएगा।

इस संबंध में भारतीय अवाम पार्टी के माध्यम से भारत एवं उत्तर प्रदेश सरकार को अवगत कराने के लिए बारा साहित्य मंच के संरक्षक श्री सरवत महमूद खान ने मंच की तरफ से बारा-ताड़ीघाट रोड पर जव्वाद ख़ाँ स्मृति द्वार निर्माण हेतु ज्ञापन कुँअर नसीम रज़ा को सौंपा। इस मौके पर अलाउद्दीन खान, खान जियाउद्दीन मुहम्मद कासिम, औरंगजेब खान आदि मौजूद रहे।

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