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लोक अदालत की अगली तिथि जानिए

लोक अदालत क्या है?

गाजीपुर: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण, सर्वाेच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय इलाहाबाद के निर्देशों पर उ0प्र0 राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, लखनऊ तथा जनपद न्यायाधीश/अध्यक्ष, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, गाजीपुर के दिशा-निर्देशन में श्रीमती कामायनी दूबे, पूर्णकालिक सचिव, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, गाजीपुर द्वारा बताया गया कि दिनांक 21.01.2023 को अपराह्न 02ः00 बजे से आर्बिट्रेशन के निष्पादन वादों (Arbitration Matters)  के निस्तारण के लिए विशेष लोक अदालत का आयोजन दीवानी न्यायालय, गाजीपुर में किया जा रहा है।


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उक्त के सम्बन्ध में गाजीपुर जनपद के समस्त नगर वासियों/ग्रामीण वासियों को यह सूचित किया जाता है कि वादकारी अपने आर्बिट्रेशन के निष्पादन वादों को दिनांक 21.01.2023 को विशेष लोक अदालत में आपसी सुलह वार्ता के आधार पर निस्तारण करा सकते है।

तत्सम्बन्ध में जिला सूचनाधिकारी, गाजीपुर वादकारी विशेष लोक अदालत में शामिल होकर अपने वादों का निश्तारण करा सकते हैं।

लोक अदालत क्या है? जानिए प्रावधान

मामलों का त्वरित विचारण व्यक्ति का मूल अधिकार है। विचारण अथवा न्याय में विलम्ब से व्यक्ति की न्यायपालिका के प्रति आस्था में गिरावट आने लगती है। अतः त्वरित विचारण की दिशा में कदम उठाने की अनुशंसा की गई है।

यह निर्विवाद है कि आज विचारण में अत्यधिक एवं अनावश्यक विलम्ब होता है। लोगों को वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कई बार तो स्थिति यह बन जाती है कि पक्षकार मर जाता है लेकिन कार्यवाही जीवित रहती है।

इस स्थिति से निपटने के लिए हालांकि समय-समय पर प्रयास किये जाते रहे हैं। फास्ट ट्रेक न्यायालय भी स्थापित किये गये तो दूसरी तरफ लोक अदालत व्यवस्था पर भी विचार रखे गए। भारत में किसी समय पंचायतों से आपसी सहमति से मामले निपटाए जाते थे, लेखक प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी पंच परमेश्वर भी इस पर ध्यान आकर्षित करती है।

इसलिए यह कहा जा सकता है कि लोक अदालत भारत की पुरानी व्यवस्था है। लोक अदालत विषय पर इस आलेख में प्रकाश डाला जा रहा है। वस्तुतः लोक अदालत एक ऐसी अदालत है जिसमें मामलों (विवादों) का निपटारा पक्षकारों की पारस्परिक सहमति से किया जाता है। इसमें न किसी पक्षकार की जीत होती है और न हार। दोनों पक्षों में पुनः स्नेह, सौहार्द्र एवं बंधुत्व का भाव उत्पन्न हो जाता है।


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इसीलिए लोक अदालत के बारे में यह कहा जाता है –

(i) यह जनता की अदालत है;

(ii) यह सुलह एवं समझौते का मंच है तथा

(iii) शीघ्र एवं सस्ते न्याय का स्रोत हैं।

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 में लोक अदालतों के बारे में प्रावधान किया गया है। लोक अदालतों का गठन अधिनियम की धारा 19(2) में लोक अदालतों के गठन के बारे में प्रावधान किया गया है।

इसके अनुसार लोक अदालतों का गठन निम्नांकित से मिलकर होता है-

(क) सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, तथा

(ख) अन्य व्यक्ति।

लोक अदालतों का पीठासीन अधिकारी सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है। अन्य व्यक्ति में ऐसे व्यक्ति होते हैं, जिन्हें-

(क) कला;

(ख) साहित्य:

(ग) संस्कृति

(प) विधि;

(ङ) न्याय

(च) समाज सेवा

(छ) पत्रकारिता

आदि क्षेत्रों में काम करने का विशिष्ट ज्ञान एवं अनुभव होता है। इनमें महिलाओं का भी पर्याप्त प्रतिनिधित्व होता है। यह सभी व्यक्ति मिलकर पक्षकारों में राजीनामा कराने का प्रयास करते हैं।

अधिकारिता अधिनियम की धारा 19 (5) के अनुसार लोक अदालतें ऐसे सभी मामलों में राजीनामों एवं समझौतों का प्रयास कर सकती है, जो,

(i) उनके समक्ष लम्बित या विचाराधीन है; अथवा

(ii) उनकी अधिकारिता में आते हैं लेकिन ये अभी न्यायालय में नहीं लाये गये हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि लोक अदालतों द्वारा विचारण से पूर्व भी विवादों का निपटारा किया जा सकता है। इसे ‘विचारणपूर्व सुलह एवं समझौते की संज्ञा दी गई है।

जहाँ तक आपराधिक मामलों में समझौते का प्रश्न है, लोक अदालतों की अधिकारिता में केवल ऐसे मामले आते हैं जो ‘राजीनामायोग्य’ है। ऐसे मामलों का उल्लेख दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 320 में किया गया है। धारा 320 की परिधि में आने वाले मामलों का राजीनामों के माध्यम से निपटारा किया जा सकता है।

ऐसे मामले, जो राजीनामें योग्य नहीं है, लोक अदालतों द्वारा

(i) न तो तय किये जा सकते हैं और

(ii) न उन्हें राजीनामें योग्य बनाया जा सकता है।

गुलाबदास बनाम स्टेट ऑफ मध्यप्रदेश के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि ऐसे मामलों में राजीनामा नहीं किया जा सकता जो धारा 320 की परिधि में नहीं आते हैं चाहे उनमें पक्षकारों में समझौता हो क्यों न हो गया हो। ऐसे मामलों में सजा की मात्रा पर विचार किया जा सकता है। 

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